Punjab Election Results Badal family politics is clouded by crisis what will happen if lost Assebmly elections


Punjab Assembly Elections Result: पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 (Punjab Election Results) के नतीजे आने में कुछ ही घंटे बचे हैं। लेकिन उससे पहले 7 मार्च को आए एग्जिट पोल के नतीजों ने कई नेताओं की नींद उड़ा दी है जिनमें सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी भी शामिल है। इन चुनावों में कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों की साख दांव पर है। 

इन्हीं में से एक है बादल परिवार। इसमें कोई शक नहीं है कि पंजाब नतीजे (Punjab Election Result 10 March) शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और इसके साथ ही बादल परिवार, खासकर पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल की किस्मत को बनाने या बिगाड़ने वाले हैं।

किसान आंदोलन के बीच अकाली दल ने बड़ी कीमत चुकाई थी। इसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) छोड़ना पड़ा और अपने सबसे पुराने गठबंधन सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अलविदा कहना पड़ा था। जिसके बाद बादल परिवार ने पंजाब चुनावों में बसपा के साथ जाने का फैसला किया। 

प्रचार में अकेले बादल फैमिली ने संभाली थी कमान

जहां कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी के चुनावी अभियान केंद्रीय नेताओं ने संभाले थे, तो वहीं शिरोमणि अकाली दल का अभियान पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में सिर्फ एक परिवार पर निर्भर रहा। 94 वर्षीय नेता ने अकेले लंबी के चार गांवों का दौरा किया था। इसके अलावा अकाली की चुनावी कमान पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और उनकी पत्नी पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के हाथों में रही। 

कहां-कहां मजबूत है बादल की अकाली?

ऐसे में इन चुनावों में न केवल बादल परिवार का राजनीतिक करियर दांव पर है बल्कि पूरी पार्टी की साख के लिए भी बड़ी चुनौती है। दशकों तक पंजाब की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद, शिरोमणि अकाली दल (शिअद) ने 2017 के चुनावों में खराब प्रदर्शन किया और उसे कांग्रेस व नवागंतुक आम आदमी पार्टी (आप) के पीछे तीसरे स्थान जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। 

हालांकि 20 फरवरी 2022 को हुए विधानसभा चुनावों से पहले अकाली के हालात में ज्यादा सुधार नहीं हुआ, लेकिन ऐसा लगता है कि शिअद ने माझा और दोआबा क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में खुद को पुनर्जीवित कर लिया। राज्य की 117 में से 48 सीटें इन्हीं दोनों क्षेत्र से आती हैं। 

अकाली ने कांग्रेस सांसद जसबीर सिंह डिंपा के भाई को पार्टी में शामिल किया था, जिनका माझा क्षेत्र के कुछ हिस्सों में काफी प्रभाव है। एक और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ बिक्रम सिंह मजीठिया को मैदान में उतारने और कई हिंदू उम्मीदवारों को टिकट देने का फैसला भी अकाली को फायदा पहुंचा सकता है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ अकाली का गठबंधन भी उसे फायदा पहुंचाएंगा, जिसका दोआबा क्षेत्र में मजबूत आधार है।

कहां-कहां होगी अकाली को मुश्किल?

हालांकि, मालवा क्षेत्र को फिर से हासिल करना, जिसमें सबसे अधिक विधानसभा सीटें (69) हैं, पंजाब की सबसे पुरानी पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह क्षेत्र कभी अकालियों का गढ़ हुआ करता था। इसके सभी प्रमुख नेता – गुरचरण सिंह तोहरा, हरचरण सिंह लोंगोवाल, सुरजीत सिंह बरनाला से लेकर प्रकाश सिंह बादल और अब उनके बेटे सुखबीर बादल तक – इसी क्षेत्र से आए थे।

आम आदमी पार्टी ने पलटी बादल परिवार का किस्मत

लेकिन आम आदमी पार्टी के प्रवेश ने मालवा की राजनीतिक को बदल दिया, और इसने 2017 में अकालियों को केवल आठ सीटों तक सीमित कर दिया। कांग्रेस भी लुधियाना और बठिंडा सहित क्षेत्र के कई शहरी इलाकों में शिरोमणि अकाली दल को सेंध लगाने में कामयाब रही थी।

माझा और दोआबा में भी शिरोमणि अकाली दल ने क्रमश: सिर्फ दो और पांच सीटें जीतीं, जो फिर से सबसे कम सीटें हैं। लेकिन ये संकेत पार्टी को पद से आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते हैं। जनमत सर्वेक्षणों ने इसे कांग्रेस और आप के बाद तीसरे स्थान पर रखा है।

एग्जिट पोल में भी कोई खास नहीं है अकाली का ‘लक’

एग्जिट पोल के सर्वेक्षणों में की गई भविष्यवाणी की मानें तो अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) पंजाब में जीत हासिल करेगी। औसतन 10 एग्जिट पोल में आप की उल्लेखनीय जीत की भविष्यवाणी की गई है। एग्जिट पोल 117 सीटों वाले पंजाब में AAP को 63 सीटें दे रहे हैं, जिसमें बहुमत के लिए 59 चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो AAP पहले पूर्ण राज्य में सत्ता संभालेगी। अमरिंदर सिंह के साथ हाथ मिलाने वाली भाजपा पंजाब में मामूली खिलाड़ी रह सकती है, जबकि उसकी पूर्व सहयोगी अकाली दल को 19 सीटें जीतने की उम्मीद है। 

क्या है बादल परिवार और अकाली दल का इतिहास

1920 में, जब पंजाब एक अविभाजित प्रांत था, तब सिखों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए, मास्टर तारा सिंह ने शिरोमणि अकाली दल की स्थापना की थी। पार्टी सिख पंथ (समुदाय) और धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित थी। बाद में प्रकाश सिंह बादल अकाली दल में शामिल हुए, जो उस समय अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए लड़ रही थी। लेकिन उनके जाने के बाद विभाजन की भयावहता ने पंजाब का बुरा हाल कर दिया। देश के साथ पंजाब भी बंटा। 1966 में, वर्तमान पंजाब का गठन किया गया था। तब अकाली दल नए पंजाब में सत्ता में आया था, लेकिन वहां की शुरुआती सरकारें पार्टी के भीतर आंतरिक संघर्ष और सत्ता संघर्ष के कारण लंबे समय तक सत्ता में नहीं रहीं। प्रकाश सिंह बादल चार बार पंजाब के सीएम रहे। 

चूंकि विभाजन के बाद से पंजाब में कम्युनिस्ट पार्टियों और कांग्रेस दोनों की मजबूत जड़ें थीं, शिअद स्वाभाविक रूप से दोनों का कड़ा विरोध करती रही। लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन कमजोर पड़ गया और धीरे-धीरे कांग्रेस ने विभाजन को गहरा करने के लिए अकाली दल की रणनीति पर प्रहार किया। बादल और तोहरा समूहों और बाद में अन्य लोगों के बीच प्रतिद्वंद्विता ने स्वर्ण मंदिर, इंदिरा गांधी की हत्या और पंजाब और शेष भारत के बीच दशकों के युद्ध की घटनाओं को जन्म दिया। 

वर्षों से, प्रकाश सिंह बादल ने चालाकी से अकाली दल के अधिकार को बनाए रखने और राजनीति पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति की पकड़ को कमजोर करने में कामयाबी हासिल की।

इस इतिहास और शिअद और कांग्रेस के बीच वैमनस्य के साथ, भाजपा एक स्वाभाविक सहयोगी बन गई थी। भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संसद में मांगे गए 2008 के विश्वास मत के दौरान शिअद-भाजपा गठबंधन की अग्नि परीक्षा हुई। जहां कई पार्टी नेताओं को भारत के पहले सिख प्रधानमंत्री के खिलाफ मतदान करने की दुविधा का सामना करना पड़ा, वहीं बादल सीनियर भाजपा के साथ दोस्ती में अडिग रहे। हालांकि सुखबीर ने कहा कि अकाली परमाणु समझौते के खिलाफ नहीं थे। इसके बाद गुजरात चुनाव की तैयारी में, बादल सीनियर द्वारा तैयार किया गया रथ था जिसे नरेंद्र मोदी ने उधार लिया और इस्तेमाल किया था।

अब बादल परिवार की राजनीति का क्या होगा?

जैसे-जैसे इसका राजनीतिक दबदबा कम होता जा रहा है, पारिवारिक व्यवसाय भी प्रभावित हो रहा है। अकाली दल अपनी राजनीतिक और वित्तीय पूंजी कैसे बनाए रखेगा? पंजाब में 2022 के विधानसभा चुनाव में एक पार्टी सरकार में और दूसरी विपक्ष में होगी। लेकिन यह चुनाव यह भी तय करेगा कि अकाली दल किस तरह से सर्वाइव करेगी।” 



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